देश की सबसे बड़ी अदालत, यानी Supreme Court of India के दरवाज़े पर एक ऐसी जनहित याचिका पहुंची, जिसने इतिहास, आस्था और राजनीति तीनों को एक ही फ्रेम में ला खड़ा किया। मांग सीधी थी, लेकिन असर बड़ा, मुगल शासक बाबर के नाम पर देश में कोई भी मस्जिद न बनाई जाए, और केंद्र व राज्य सरकारों को इस बारे में स्पष्ट दिशा-निर्देश देने का आदेश दिया जाए। दलील दी गई कि बाबर एक आक्रमणकारी था, इसलिए उसके नाम पर धार्मिक स्थल का नामकरण उचित नहीं। मगर अदालत में भावनाएं नहीं, दलीलें चलती हैं। और दलीलों की कसौटी पर यह याचिका टिक नहीं पाई। सुप्रीम कोर्ट ने शुरुआती सुनवाई में ही साफ कर दिया कि हर वैचारिक या ऐतिहासिक असहमति न्यायिक आदेश का विषय नहीं बन सकती। अदालत ने कहा किसी भी याचिका को आगे बढ़ाने के लिए यह दिखाना जरूरी है कि कोई मौलिक अधिकार प्रभावित हो रहा है, या कोई स्पष्ट संवैधानिक प्रावधान टूटा है। यहां ऐसा कुछ ठोस सामने नहीं आया। कोर्ट का रुख यह भी रहा कि धार्मिक स्थलों का नामकरण सामान्यत समुदायों, ट्रस्टों या प्रशासनिक ढांचे के दायरे में आता है। जब तक कोई प्रत्यक्ष कानूनी उल्लंघन न दिखे, तब तक अदालत नीतिगत मामलों में हस्तक्षेप नहीं करती। नतीजा याचिका प्रारंभिक चरण में ही खारिज हो गयी, इतिहास की किताबें गवाही देती हैं कि बाबर ने 1526 में पानीपत की पहली लड़ाई के बाद भारत में मुगल सत्ता की नींव रखी। सदियों बाद भी उसका नाम विवादों में आता है। लेकिन अदालत ने इशारा किया इतिहास पर राय अलग-अलग हो सकती है, पर अदालत की कलम सिर्फ संविधान की स्याही से चलती है। इस फैसले का मतलब क्या है? यह कि सुप्रीम कोर्ट ने किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व पर टिप्पणी नहीं की, बल्कि सिर्फ यह कहा कि अदालत विचारधारात्मक बहसों का मंच नहीं बन सकती। अगर कोई मुद्दा कानून की ठोस जमीन पर खड़ा नहीं है, तो वह अदालत की चौखट पार नहीं कर पाएगा। संदेश था देश में बहसें जारी रह सकती हैं, राजनीति अपनी दिशा में चल सकती है, लेकिन न्यायपालिका की भूमिका सीमित और स्पष्ट है। भावनाओं से नहीं, संवैधानिक सिद्धांतों से।
जब देश अंतरराष्ट्रीय मंच पर खड़ा होकर कह रहा हो कि हम भविष्य की तकनीक लिखेंगे तब अगर कोई अपनी ही स्याही से देश की तस्वीर पर दाग लगाने लगे, तो सवाल उठता है यह विरोध है या नीच मानसिकता? क्या यही है वह राजनीति, जो हर बड़े मौके को छोटे एजेंडे में बदल देती है? कांग्रेस का विपक्ष होना लोकतंत्र की खूबसूरती है। लेकिन हर मौके को तमाशे में बदल देना यह खूबसूरती नहीं, हड़बड़ी है। सरकार से असहमति रखिए, नीतियों पर हमला कीजिए, बेरोज़गारी पर सवाल उठाइए लेकिन क्या हर अंतरराष्ट्रीय मंच को घरेलू सियासत की अखाड़ा बना देना ही रणनीति है? क्या देश जब ग्लोबल स्तर पर खुद को टेक्नोलॉजी और AI की ताकत के रूप में पेश कर रहा हो, तब वही समय चुना जाएगा अपनी नाराजगी को नारे और नाटकीय प्रतीकों में बदलने के लिए? आलोचक कह रहे हैं यह वही राजनीति है जो बड़े मंच को छोटा कर देती है। जहां देश की छवि से पहले पार्टी की सुर्खियां रखी जाती हैं। जहां कैमरा ऑन है यह ज़्यादा मायने रखता है, देश देख रहा है ये उनके लिए कम मायने रखता है। सवाल यह भी है कि क्या राष्ट्रीय गौरव और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा अब सिर्फ सत्ता की जिम्मेदारी है? विपक्ष की नहीं? कई लोगों का मानना है कि इस तरह की हरकतें यह संदेश देती हैं कि पार्टी की रणनीति मुद्दों से ज्यादा दृश्य प्रभाव पर टिकी है। छोटी राजनीति बनाम ऊंचा मंच यह टकराव साफ दिखता है। जब देश भविष्य की बात कर रहा हो, तब अगर कोई अतीत की निराशा को मंच पर पटक दे, तो तस्वीर क्या बनती है? AI समिट के दौरान Indian Youth Congress के कुछ कार्यकर्ताओं ने नारेबाजी की और शर्ट उतारकर विरोध जताया। सुरक्षा एजेंसियों को तुरंत दखल देना पड़ा। दिल्ली पुलिस ने 4 लोगों को गिरफ्तार किया, 3 को हिरासत में लिया और गैर-जमानती धाराओं में FIR दर्ज की। मामले में IYC अध्यक्ष Uday Bhanu Chib से मंदिर मार्ग थाने में पूछताछ जारी है। जांच इस बात पर केंद्रित है कि हाई-सिक्योरिटी जोन में प्रवेश कैसे मिला, टी-शर्ट्स कहां प्रिंट हुईं, फंडिंग का स्रोत क्या था और पूरी प्लानिंग किस स्तर पर हुई। कांग्रेस समर्थक कहेंगे यह लोकतांत्रिक अधिकार है। आलोचक कहेंगे यह अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश की छवि को चोट पहुंचाने वाली जल्दबाजी है। बहस जारी है। लेकिन एक बड़ा सवाल हवा में है क्या राष्ट्रीय मंच पर विरोध का तरीका भी राष्ट्रीय स्तर का होना चाहिए, या फिर वही पुरानी राजनीतिक शैली चलेगी जिसमें सुर्खियां ही असली जीत मानी जाती हैं? देश आगे बढ़ने की बात कर रहा है। टेक्नोलॉजी, स्टार्टअप, AI सब भविष्य की भाषा है। और उसी समय अगर राजनीति अपनी पुरानी लय में अटक जाए, तो टकराव तो होगा ही। अब फैसला जनता के हाथ में है यह साहसिक विरोध था या फिर वह क्षण, जब राजनीति ने खुद ही अपनी सीमा लांघ दी?
Indore की सियासत में 21 फरवरी की दोपहर कुछ ऐसी गरमी लेकर आई, जिसे सिर्फ मौसम से नहीं समझा जा सकता। दिल्ली में कॉंग्रेस की उतरी शर्ट की तस्वीरें सोशल मीडिया पर तैरती रहीं और अगले दिन उनकी गूंज इंदौर तक पहुँच गई। Gandhi Bhavan के बाहर माहौल पहले से ही गर्म था। Bjp और Congress के कार्यकर्ता आमने-सामने थे। नारेबाज़ी की आवाज़ें तेज़ हुईं, तकरार बढ़ी, और फिर धक्का-मुक्की ने जगह ले ली। देखते-देखते पत्थर चले कुछ जगहों पर बोतलें और अन्य चीज़ें भी फेंके जाने की रिपोर्टें आईं। सोर्स के मुताबिक हालात बेकाबू होते देख पुलिस ने बैरिकेडिंग की, भीड़ को पीछे धकेला और वॉटर कैनन का इस्तेमाल कर प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर किया। इस अफरा-तफरी में एक पुलिस सब-इंस्पेक्टर के घायल होने और कुछ पत्रकारों के चोटिल होने की पुष्टि हुई। कई कार्यकर्ताओं को मौके से हिरासत में लेकर थाने ले जाया गया। राजनीतिक बयानबाज़ी भी कम नहीं रही। बीजेपी ने दिल्ली के शर्टलेस प्रदर्शन को “देश की छवि को नुकसान पहुँचाने वाला” कहा और इंदौर में विरोध को “जन-आक्रोश” बताया। कांग्रेस ने पलटवार करते हुए कहा कि लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है और इंदौर की झड़प “उकसावे का परिणाम” है। दोनों पक्ष अपने-अपने तर्कों के साथ डटे रहे, लेकिन सड़कों पर जो दिखा वह यह कि बयान से शुरू हुई बहस कभी-कभी पत्थर तक पहुँच जाती है। 20 फरवरी को दिल्ली में हुआ प्रतीकात्मक प्रदर्शन 21 फरवरी को इंदौर में वास्तविक टकराव में बदल गया। पुलिस की मौजूदगी, बैरिकेड, वॉटर कैनन और घायल अधिकारी ये सब इस बात की गवाही देते हैं कि राजनीतिक तापमान कितनी तेजी से बढ़ सकता है। सवाल यह है कि क्या विरोध की भाषा अब और तीखी होगी, या फिर दल अपने-अपने कार्यकर्ताओं को संयम का संदेश देंगे? इंदौर की सड़कों ने फिलहाल यही बताया है कि सियासत में “एक मंच की चिंगारी” दूसरे शहर में “पूरा अलाव” बन सकती है