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Breaking News 24 February 2026

1 )  सिंगापुर में CM योगी की ₹6650 करोड़ की डील

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जब सिंगापुर की धरती पर उतरे तो यह सिर्फ एक विदेश दौरा नहीं था, बल्कि संदेश था यूपी अब निवेश मांगने नहीं, साझेदारी करने आया है। 22 से 24 फरवरी 2026 तक चल रहे इस आधिकारिक दौरे के पहले ही दिन सरकार ने बड़ा दावा किया ₹6,650 करोड़ के निवेश समझौते पक्के हुए। तीन बड़े MoU साइन हुए और अनुमान लगाया गया कि करीब 20,000 से ज्यादा रोजगार के अवसर पैदा होंगे। यह करार सिंगापुर की Universal Success Group के साथ हुआ है, और इसमें रियल एस्टेट, लॉजिस्टिक्स और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे सेक्टर शामिल हैं। पहला और सबसे बड़ा दांव जेवर इंटरनेशनल एयरपोर्ट के पास, YEIDA क्षेत्र में लगभग 100 एकड़ जमीन पर ₹3,500 करोड़ की लागत से एक इंटरनेशनल थीम-बेस्ड टाउनशिप। सरकार का कहना है कि यह सिर्फ मकानों का प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि ‘ग्लोबल लाइफस्टाइल’ का मॉडल होगा। 2027 तक इसे जमीन पर उतारने की योजना है और लगभग 12,000 लोगों को रोजगार मिलने का दावा किया गया है। मतलब, एयरपोर्ट के साथ-साथ अब उसके आसपास की जमीन भी ग्लोबल नक्शे पर चढ़ाने की तैयारी है। दूसरा प्रोजेक्ट कानपुर-लखनऊ हाईवे पर लगभग 50 एकड़ में ₹650 करोड़ का लॉजिस्टिक्स पार्क है। यह उत्तर प्रदेश की सप्लाई चेन और इंडस्ट्रियल मूवमेंट को नया इंजन देने की कोशिश बताई जा रही है। यहां से करीब 7,500 नौकरियों के सृजन की बात कही गई है। अगर यह जमीन पर तेजी से उतरा, तो पूर्वांचल और मध्य यूपी के औद्योगिक गलियारों को सीधा फायदा मिल सकता है। तीसरा और सबसे ‘टेक्निकल’ दांव नोएडा क्षेत्र में 10 एकड़ पर ₹2,500 करोड़ का हाइपरस्केल डेटा सेंटर पार्क होगा...करीब 40 मेगावॉट आईटी पावर क्षमता वाला यह प्रोजेक्ट 2028 तक चालू करने का लक्ष्य है। यहां लगभग 1,500 रोजगार के अवसर बनने की बात कही गई है। डिजिटल इंडिया के दौर में डेटा नया तेल माना जा रहा है, और यूपी इस तेल के कुएं को अपने यहां खड़ा करना चाहता है। दौरे के दौरान ग्रीन एनर्जी, ग्रीन हाइड्रोजन, सौर ऊर्जा, सेमीकंडक्टर, स्किल डेवलपमेंट और फाइनेंशियल सेक्टर में सहयोग जैसे मुद्दों पर भी बातचीत हुई। बैंकिंग सेक्टर और निवेशकों के साथ बैठकों में यह बताने की कोशिश हुई कि उत्तर प्रदेश अब ‘नीति, नियत और निवेश’ तीनों में स्थिरता दिखा रहा है। लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। MoU साइन होना पहली सीढ़ी है, मंजिल नहीं। पहले भी कई निवेश समझौते हुए, जिनमें से कुछ जमीन पर उतरे, कुछ फाइलों में ही घूमते रह गए। असली कसौटी होगी कितनी तेजी से जमीन आवंटन होगा, पर्यावरणीय मंजूरी कितनी जल्दी मिलेगी, और निवेशक कितने समय में काम शुरू करेंगे। कुल मिलाकर, सिंगापुर दौरे का पहला दिन आंकड़ों के लिहाज से सरकार के लिए सफल बताया जा रहा है ₹6,650 करोड़, तीन बड़े प्रोजेक्ट, 20 हजार रोजगार का दावा। अब निगाह इस पर है कि यह ‘ग्लोबल यूपी’ का नारा कागज से निकलकर कितनी तेजी से कंक्रीट और स्टील में बदलता है।

 

2) 22 भाषाओं में लाइव ट्रांसलेट वाला क्या है Sarvam Ai? 

भारत में जब भी टेक्नोलॉजी की बड़ी बात होती है, तो ज़्यादातर नाम बाहर से आते हैं। AI की बात अब सिर्फ स्टार्टअप पिच या टेक कॉन्फ्रेंस तक सीमित नहीं रही। अब यह पॉलिसी, पावर और पहचान से जुड़ चुकी है। इसी बहस के बीच एक नाम तेजी से उभरा है Sarvam AI।, सवाल ये है कि क्या यह भारत को AI की दुनिया में एक अलग पहचान दे सकता है? 2023 में शुरू हुई इस कंपनी को बनाया है Vivek Raghavan और Pratyush Kumar ने। दोनों का बैकग्राउंड गंभीर टेक रिसर्च और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ा रहा है। उनका मकसद साफ है एक ऐसा Large Language Model बनाना जो भारतीय भाषाओं और भारतीय यूज़र्स के लिए ऑप्टिमाइज़्ड हो। अब यहाँ समझना जरूरी है कि भारतीय भाषाओं के लिए AI सुनने में जितना आसान लगता है, उतना है नहीं। आज AI की रेस में आगे हैं OpenAI, Google और चीन की Baidu। इनके मॉडल ट्रिलियंस टोकन डेटा पर ट्रेन हुए हैं, और उनके पीछे अरबों डॉलर की फंडिंग है। लेकिन इन मॉडलों की एक सीमा है ये मुख्य रूप से अंग्रेज़ी या बड़े ग्लोबल डेटा सेट पर आधारित हैं। भारत की 22 आधिकारिक भाषाएँ, सैकड़ों बोलियाँ, और अलग-अलग सांस्कृतिक संदर्भ उस स्तर पर मौजूद नहीं हैं। ट्रांसलेशन तो हो जाता है, लेकिन टोन, मुहावरा, सामाजिक संदर्भ वो अक्सर मिस हो जाता है। Sarvam AI धीरे-धीरे अपना मॉडल डेवलप कर रहा है। यह कोई iPhone लॉन्च जैसा प्रोडक्ट इवेंट नहीं है।
पहले वे मॉडल डेवलप करेंगे, फिर उसे API के जरिए कंपनियों और सरकार को देंगे। मतलब आप सीधे “Sarvam App” नहीं देखेंगे। आप शायद किसी बैंक ऐप, सरकारी पोर्टल या एजुकेशन प्लेटफॉर्म में इसका इस्तेमाल महसूस करेंगे। Sarvam AI का दावा है कि वह सिर्फ भाषा का अनुवाद नहीं, बल्कि भाषा की समझ विकसित करना चाहता है। यानी अगर कोई हिंदी में सवाल पूछे तो जवाब अंग्रेज़ी की सोच से ट्रांसलेट होकर न आए, बल्कि हिंदी के सामाजिक और सांस्कृतिक ढांचे में फिट बैठे। यही असली चैलेंज है। AI Summit में जब 22 भाषाओं में लाइव ट्रांसलेशन का डेमो दिखाया गया, तो यह सिर्फ टेक्निकल फीचर नहीं था। यह एक मैसेज था कि भारत की डिजिटल आबादी को अंग्रेज़ी के जरिए फिल्टर नहीं किया जाएगा। अगर टेक्नोलॉजी सच में “इंक्लूसिव” होनी है, तो उसे भाषा की बाधा तोड़नी होगी। लेकिन यहाँ भावनात्मक उत्साह से ज्यादा जरूरी है टेक्निकल रियलिटी। Large Language Model बनाना सस्ता खेल नहीं है। इसके लिए हाई-एंड GPU, विशाल डेटा सेट, और भारी कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए। OpenAI और Google जैसी कंपनियाँ सालाना अरबों डॉलर खर्च कर रही हैं। ऐसे में Sarvam AI को सिर्फ नेशनल सपोर्ट नहीं, बल्कि इंटरनेशनल लेवल की परफॉर्मेंस देनी होगी। क्योंकि यूज़र भावनाओं से ज्यादा क्वालिटी देखता है। अगर जवाब सटीक नहीं हुआ, अगर मॉडल स्लो हुआ, तो लोग दो क्लिक में दूसरे प्लेटफॉर्म पर चले जाएंगे। फिर भी, इस प्रोजेक्ट का महत्व कम नहीं होता। अगर भारत अपना मजबूत AI मॉडल खड़ा करता है, तो इसका मतलब होगा डेटा पर ज्यादा नियंत्रण। इसे AI Sovereignty कहा जाता है यानी डेटा भी अपना, मॉडल भी अपना, और प्राथमिकता भी अपनी। आने वाले समय में AI सिर्फ टेक्नोलॉजी नहीं रहेगा, यह जियोपॉलिटिक्स का हिस्सा होगा। जो देश अपने डेटा और AI पर कंट्रोल रखेगा, वही डिजिटल पावर में आगे रहेगा। इसे सामाजिक नजरिए से देखें तो असर और बड़ा हो सकता है। एक छात्र अपनी मातृभाषा में कोडिंग समझ सके। एक किसान अपनी भाषा में मौसम और सरकारी योजना की जानकारी ले सके। छोटे शहर का उद्यमी बिना अंग्रेज़ी के भी AI टूल्स इस्तेमाल कर सके। यही असली डिजिटल डेमोक्रेसी होगी। लेकिन अभी रास्ता लंबा है। Sarvam AI को स्केल, क्वालिटी, फंडिंग और ग्लोबल कंपटीशन से लड़ना होगा। यह आसान नहीं है। पर कोशिश महत्वपूर्ण है। दुनिया AI बना रही है। भारत कोशिश कर रहा है कि AI उसकी भाषा समझे। अगर यह प्रयोग सफल हुआ, तो यह सिर्फ एक स्टार्टअप की सफलता नहीं होगी। यह उस सोच की जीत होगी जो कहती है टेक्नोलॉजी borrowed नहीं, built होनी चाहिए।

 

3 ) AI Summit करवाने से भारत को क्या फायदा हुआ?

दिल्ली में इस बार मंच पर बैठा था भविष्य। नाम था India AI Summit। मंच पर बड़े-बड़े शब्द उछले जैसे ग्लोबल साउथ, रिस्पॉन्सिबल टेक्नोलॉजी। दुनिया के 100 से ज्यादा देश, बड़ी टेक कंपनियाँ, निवेशक, नीति-निर्माता… सब मौजूद थे। और सवाल ये नहीं कि कौन आया। सवाल ये है इससे भारत को मिला क्या? आइए जानते हैं....सबसे पहले भारत की इमेज Power बनी...अब तक AI की दुनिया में अमेरिका, चीन, यूरोप के नाम गूंजते थे। भारत यूज़र था, मेकर नहीं। इस समिट के जरिए भारत ने कहा हम सिर्फ ऐप डाउनलोड करने वाले नहीं हैं, हम ऐप बनाने वाले भी बनना चाहते हैं। कूटनीतिक भाषा में कहें तो  भारत ने AI की टेबल पर अपनी कुर्सी खींच ली। दूसरा फायदा हुआ निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर के वादे से, समिट के दौरान अरबों डॉलर के निवेश और डीप-टेक फंडिंग की घोषणाएँ हुईं। डेटा सेंटर, चिप डिजाइन, AI स्टार्टअप्स, रिसर्च हब इन सब पर जोर दिया गया। तो इसका मतलब क्या हुआ? मतलब अगर वादे जमीन पर उतरे तो नौकरियाँ बनेंगी। इंजीनियर, डेटा साइंटिस्ट, रिसर्चर, क्लाउड एक्सपर्ट नई मांग पैदा होगी। यानी AI सिर्फ चैटबॉट नहीं रहेगा, रोजगार का जरिया भी बन सकता है। तीसरा फायदा हुआ सॉवरेन AI का नैरेटिव से। ये शब्द बड़ा है, लेकिन मतलब सीधा है अपना डेटा, अपने सर्वर, अपने नियम। अभी तक दुनिया की बड़ी टेक कंपनियाँ डेटा के जरिए ताकत रखती हैं। भारत ने साफ कहा कि AI ऐसा होगा जो भारतीय कानून और भारतीय हित के हिसाब से चले। यह टेक्नोलॉजी की आजादी की तरफ कदम माना जा रहा है। चौथा फायदा हुआ ग्लोबल साउथ की अगुवाई से। यह समिट सिर्फ टेक्नोलॉजी शो नहीं था। इसमें यह संदेश भी छुपा था कि AI का भविष्य सिर्फ अमीर देशों तक सीमित नहीं रहेगा। भारत ने “People, Planet, Progress” जैसे सूत्रों की बात की यानी टेक्नोलॉजी इंसान और पर्यावरण के लिए हो, सिर्फ मुनाफे के लिए नहीं। इससे भारत ने खुद को एक जिम्मेदार के तौर पर पेश किया। लेकिन अब असली सवाल क्या सिर्फ समिट कराने से फायदा हो जाता है? इतिहास गवाह है, बड़े-बड़े इवेंट होते हैं, घोषणाएँ होती हैं, फिर फाइलें धूल खाती हैं। AI Summit से फायदा तभी होगा जब निवेश सच में आए, स्टार्टअप्स को आसान फंडिंग मिले, गांव तक टेक्नोलॉजी पहुँचे और युवाओं को ट्रेनिंग मिले वरना यह भी एक इवेंट बनकर रह जाएगा। और हाँ, डर भी है। AI नौकरियाँ बनाएगा  लेकिन कुछ नौकरियाँ खत्म भी करेगा। ऑटोमेशन बढ़ेगा। कंटेंट, कस्टमर सर्विस, कोडिंग हर क्षेत्र में बदलाव आएगा। तो सरकार और उद्योग को स्किलिंग पर बराबर ध्यान देना होगा। यानी AI Summit ने भारत को तीन चीजें दीं  वैश्विक पहचान, निवेश की संभावना और टेक्नोलॉजी नेतृत्व का दावा। अब असली परीक्षा शुरू होती है। घोषणाएँ हो चुकी हैं। तालियाँ बज चुकी हैं। अब देखना ये है क्या भारत AI की दौड़ में सच में आगे निकलता है, या सिर्फ इवेंट मैनेजमेंट में ही अव्वल रहता है?