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Breaking News 25 February 2026

1 ) क्या योगी आदित्यनाथ प्रधानमंत्री बनने की तैयारी कर रहे हैं…

क्या योगी आदित्यनाथ को प्रधानमंत्री बनाने की प्रैक्टिस चल रही है? और अगर सच में तैयारी शुरू हो गई है, तो फिर राहुल गांधी का क्या होगा? सिंगापुर की चमचमाती स्काईलाइन के बीच जब योगी की तस्वीरें आईं, तो प्रेस रिलीज़ में लिखा था निवेश, इंफ्रास्ट्रक्चर, ग्लोबल पार्टनरशिप। लेकिन इंटरनेट ने लिखा Next प्राइम मिनिस्टर लोडिंग.....सवाल उठने लगा कि यह मुख्यमंत्री की विज़िट थी या प्रधानमंत्री वाली रिहर्सल? विदेशी निवेशकों से मुलाकात, उत्तर प्रदेश को एशिया की ग्रोथ स्टोरी बताने का आत्मविश्वास, और मंच पर खड़े होकर जिस अंदाज़ में उन्होंने बात रखी वह एक बड़े कैनवास की तैयारी जैसा महसूस हुआ।
अब आधिकारिक तौर पर तो बीजेपी में उत्तराधिकारी का फैसला सोशल मीडिया ट्रेंड से नहीं होता है । लेकिन राजनीति में संकेत हमेशा बयान से पहले आते हैं। योगी का कद लगातार बढ़ा है देश के सबसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री, मजबूत प्रशासनिक छवि, कोर वोटर से सीधा कनेक्शन और एक ऐसा ब्रांड जो “सख्त नेतृत्व” की भाषा बोलता है। यही वजह है कि जब वे सिंगापुर गए तो चर्चा सिर्फ MoU की नहीं हुई, चर्चा ये हुई कि और भी तो मुख्यमंत्री जाते है लेकिन योगी जी के विदेश दौरे से जनता को कुछ ज्यादा की एक्साइटमेंट आ गया । अब ज़रा फ्रेम बदलकर देखते है।  कई सालों से राष्ट्रीय राजनीति को “मोदी बनाम राहुल” के एंगल से देखा गया। लेकिन अगर आने वाले समय में मुकाबला “योगी बनाम राहुल” हो जाए तो? यहां खेल का टोन बदल जाता है। राहुल गांधी की राजनीति का नैरेटिव सामाजिक न्याय, आर्थिक असमानता और विचारधारा की बहस पर खड़ा है। दूसरी तरफ योगी की राजनीति कानून-व्यवस्था, स्पष्ट वैचारिक पहचान और आक्रामक प्रशासनिक मॉडल पर आधारित है। एक तरफ संवाद की राजनीति, दूसरी तरफ निर्णायक छवि की राजनीति। अगर यह फ्रेम बना तो राहुल को सिर्फ आलोचना नहीं, नई रणनीति भी बनानी पड़ेगी। क्योंकि सीएम योगी का वोटर बेस भावनात्मक और वैचारिक दोनों स्तर पर जुड़ा हुआ है। राजनीति में हर विदेशी दौरा उत्तराधिकार की घोषणा नहीं होता। लेकिन यह भी सच है कि राष्ट्रीय छवि ऐसे ही बनती है पहले ग्लोबल मंच, फिर घरेलू चर्चा, फिर नैरेटिव का निर्माण। असल सवाल यह नहीं कि योगी प्रधानमंत्री बनेंगे या नहीं। असल सवाल यह है कि अगर बीजेपी के भीतर अगला चेहरा उभरता है, तो विपक्ष की चाल क्या होगी? क्या राहुल गांधी अपनी राजनीति का नया संस्करण तैयार कर पाएंगे? या फिर मुकाबला शैली और स्ट्रेटेजी का हो जाएगा, जहां एक तरफ प्रशासनिक आक्रामकता होगी और दूसरी तरफ वैचारिक बहस? सिंगापुर की यह यात्रा दिल्ली की कुर्सी की गारंटी नहीं है, लेकिन यह इतना जरूर बता रही है कि योगी अब सिर्फ लखनऊ की राजनीति तक सीमित नहीं रहेंगे ।

 

2 ) Boong की जीत: बॉलीवुड के लिए सबक या सिग्नल?

जिस फिल्म को अभी तक आधा भारत जानता भी नहीं, उसने पहले ही दुनिया को बता दिया कि हम कौन हैं। जिस मूवी का नाम आपने शायद पहली बार सुना वही फिल्म सीधे जाकर BAFTA उठा लाई।  फिल्म का नाम है बूंग। हां, वही BAFTA, जो दुनिया के सबसे बड़े फिल्म अवॉर्ड्स में गिना जाता है। और ये कोई बॉलीवुड की 500 करोड़ वाली चमचमाती फिल्म नहीं, बल्कि मणिपुर की मिट्टी से निकली एक सादी, सच्ची और दिल छू लेने वाली कहानी है। भारतीय सिनेमा के लिए ये सिर्फ अवॉर्ड नहीं, एक झन्नाटेदार थप्पड़ है उस सोच पर जो मानती है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर जाने के लिए सिर्फ बड़े बजट और बड़े सितारे चाहिए। ‘बूंग’ मणिपुर की कहानी है लेकिन सच कहें तो ये हर उस घर की कहानी है जहां एक बच्चा अपने टूटे परिवार को जोड़ने का सपना देखता है। गूगुन किपगेन ने छोटे से बूंग का किरदार निभाया है, जो अपनी मां मंदाकिनी के साथ रहता है। मां अकेली है, पिता लापता हैं, और बूंग के दिल में एक ही मिशन है अपने परिवार को फिर से पूरा करना। वो अपने दोस्त के साथ निकल पड़ता है पिता को खोजने। इस सफर में मासूमियत है, दर्द है, उम्मीद है और मां-बेटे के रिश्ते की वो गर्माहट है जो किसी भी बड़े सेट या VFX से ज्यादा ताकतवर है। फिल्म को एक्सेल एंटरटेनमेंट, चॉकबोर्ड एंटरटेनमेंट और सूटेबल पिक्चर्स ने मिलकर बनाया है। लेकिन असली ताकत प्रोडक्शन हाउस नहीं, कहानी की सच्चाई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस उपलब्धि पर मेकर्स और कलाकारों को बधाई दी और कहा कि यह खासकर मणिपुर के लिए गर्व का पल है और देश की रचनात्मक प्रतिभा को उजागर करता है। सोचिए, जिस मणिपुर को हम अक्सर सिर्फ संकट और खबरों के जरिए जानते हैं, उसी मणिपुर की कहानी अब दुनिया के सबसे बड़े मंच पर तालियां बटोर रही है। ‘बूंग’ ने दिखा दिया कि भारत सिर्फ मुंबई की चकाचौंध नहीं है। भारत वो भी है जो इंफाल की गलियों में पलता है, जो छोटे-छोटे घरों में बड़े सपने देखता है। ये जीत सिर्फ एक ट्रॉफी नहीं है। ये उस सिनेमा की जीत है जो बॉक्स ऑफिस से आगे जाकर आत्मा को छूता है। ये उस भारत की जीत है जिसकी कहानियां अक्सर ‘मेनस्ट्रीम’ की भीड़ में दब जाती हैं। ‘बूंग’ ने साबित कर दिया कि अगर कहानी में सच है, भावना है और मिट्टी की खुशबू है तो वो लंदन तक पहुंचकर भी लोगों के दिल जीत सकती है।