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Breaking News 26 February 2026

1 ) PM मोदी बने दुनिया के सबसे बड़े सोशल मीडिया नेता 

क्या 100 मिलियन लोग अचानक किसी नेता को फॉलो कर लेते हैं? क्या ये सिर्फ लोकप्रियता है? या ये सालों में बनाया गया डिजिटल-पॉलिटिकल आर्किटेक्चर है? भारत के प्रधानमंत्री Narendra Modi ने इंस्टाग्राम पर 10 करोड़ फॉलोअर्स का आंकड़ा पार कर लिया है। वे ऐसा करने वाले दुनिया के पहले सिटिंग वर्ल्ड लीडर बन गए हैं। प्रधानमंत्री Modi के इंस्टाग्राम पर इतने फॉलोअर्स और लोगों को इनफ्लुएंस करने के पीछे कई सारे फैक्टर्स है । सबसे बड़ा फैक्टर है Narrative Centralization। मोदी की डिजिटल टीम एक बिखरी हुई कहानी नहीं चलाती। हर इवेंट चाहे वह संसद में भाषण हो, किसी मंदिर का दौरा हो, किसी विदेशी नेता से मुलाकात हो उसे एक बड़े नैरेटिव में फिट किया जाता है मजबूत भारत, निर्णायक नेतृत्व। इसीलिए एल्गोरिद्म स्थिर और स्पष्ट पहचान को पसंद करता है। जब एक पब्लिक फिगर का डिजिटल चेहरा कंसिस्टेंट होता है, तो ग्रोथ तेज होती है। दूसरा फैक्टर है High Emotional Resonance Index। इंस्टाग्राम पर डेटा साफ बताता है भावनात्मक कंटेंट न्यूट्रल कंटेंट से ज्यादा फैलता है। मोदी का डिजिटल प्रेज़ेंस अक्सर राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक प्रतीकों, सैनिकों, परंपरा और वैश्विक मंच पर भारत की छवि से जुड़ा रहता है। यह कंटेंट सिर्फ सूचना नहीं देता, पहचान को छूता है। और पहचान से जुड़ा कंटेंट शेयर ज्यादा होता है, फॉलो कन्वर्ज़न ज्यादा देता है। तीसरा फैक्टर है Diaspora Multiplier Effect। लगभग हर बड़े विदेशी दौरे में भारतीय प्रवासी समुदाय की बड़ी रैलियां होती हैं। यह भीड़ सिर्फ इवेंट नहीं होती, यह डिजिटल एम्प्लीफायर होती है। अमेरिका, यूके, ऑस्ट्रेलिया, मध्य-पूर्व वहां की भीड़ रील बनाती है, क्लिप शेयर करती है, और एक ग्लोबल इकोसिस्टम तैयार होता है। इस वजह से मोदी का अकाउंट सिर्फ भारतीय यूजर्स तक सीमित नहीं रहता। चौथा फैक्टर है Power Visibility Principle। राजनीति में लोग सिर्फ व्यक्ति को नहीं, शक्ति को फॉलो करते हैं। जब कोई नेता G20 जैसे मंच पर केंद्र में दिखाई देता है, जब वैश्विक संकटों में उसका बयान सुर्खी बनता है, तो उसकी search volume बढ़ती है। सर्च बढ़ती है तो प्रोफाइल विजिट बढ़ती है, और विजिट से फॉलो कन्वर्ज़न होता है। अब इज़राइल वाले दृश्य को भी इसी फ्रेम में देखिए। जब वे Knesset में पहुंचे और “Modi, Modi” के नारे लगे वह सिर्फ कूटनीतिक सम्मान नहीं था। वह एक हाई-विजुअल मोमेंट था। ऐसे क्षण एल्गोरिद्म में स्पाइक बनाते हैं। लोग सर्च करते हैं, क्लिप्स देखते हैं, और उस वक्त फॉलो बटन ज्यादा दबता है। एक और टेक्निकल बात Consistency Over Virality। कई नेता वायरल होते हैं, लेकिन स्थायी नहीं होते। मोदी की डिजिटल उपस्थिति लगभग एक दशक से नियमित है। एल्गोरिद्म ऐसे अकाउंट को Authority Node मानने लगता है। इससे उनकी पोस्ट की शुरुआती पहुँच तेज हो जाती है, और वही आगे ऑर्गैनिक ग्रोथ को बढ़ाती है। लेकिन पूरी तस्वीर यहीं खत्म नहीं होती। आलोचक यह भी कहते हैं कि सत्ता में होने का लाभ डिजिटल ग्रोथ में भूमिका निभाता है। मीडिया कवरेज, सरकारी इवेंट्स, आधिकारिक दृश्यता यह सब मिलकर डिजिटल एक्सपोज़र को स्वाभाविक रूप से बढ़ाता है। यानी लोकप्रियता और पद की शक्ति एक-दूसरे को मजबूत करते हैं। तो 10 करोड़ फॉलोअर्स का असली मतलब क्या है? यह सिर्फ लोगों का समर्थन नहीं, यह एक दशक में तैयार की गई राजनीति और बड़े लेवल के इनफ्लुएंस का परिणाम है।

 

2 ) चुनावी खर्च पर बड़ा सवाल : सुप्रीम कोर्ट अब लेगा हिसाब 

देश की सबसे बड़ी अदालत, सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया, ने चुनावी राजनीति के उस हिस्से पर उंगली रख दी है, जिस पर अब तक बस फुसफुसाहट होती थी। एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने केंद्र सरकार और भारतीय चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर दिया है और साफ कहा है छह हफ्ते में बताइए, राजनीतिक दलों के चुनावी खर्च पर सीमा क्यों न तय किया जाए? याचिका दायर की है NGO कॉमन कॉज ने, और अदालत में उनकी तरफ से वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण खड़े हुए। दलील सीधी है जब प्रत्याशी के खर्च पर सीमा है, तो पार्टियों के लिए खुला मैदान क्यों? लोकतंत्र कोई ‘ओपन माइक’ नहीं है जहाँ जिसके पास ज्यादा पैसा हो, वही ज्यादा देर बोले। अभी हालात ये हैं कि लोकसभा चुनाव में एक उम्मीदवार के खर्च की सीमा तय है राज्य के हिसाब से करीब 70 से 95 लाख रुपये तक but पार्टी के केंद्रीय प्रचार, हेलीपैड वाली रैलियाँ, टीवी-डिजिटल विज्ञापन, सोशल मीडिया वार रूम… इन सब पर कोई सीधी कानूनी कैप नहीं है नतीजा? चुनाव विचारों का कम, संसाधनों का ज्यादा मुकाबला बन जाता है। याचिका में कहा गया है कि यह असमानता लोकतांत्रिक संतुलन बिगाड़ती है धनबल वाले दलों को अप्रत्यक्ष बढ़त देती है, और छोटे दल या नए राजनीतिक विकल्प शुरुआत में ही हांफने लगते हैं। सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी माना कि विकसित लोकतंत्रों में खर्च नियंत्रण की बहस नई नहीं है। लेकिन भारत में मुश्किल यह है कि खर्च सीधे पार्टी से ही नहीं, ‘तीसरे पक्ष’ या सहयोगी समूहों के जरिए भी होता है यानी पैसा बहता है, पर रास्ते कई होते हैं। ऐसे में सवाल सिर्फ सीमा तय करने का नहीं, उसे लागू करने का भी है। अदालत ने केंद्र और चुनाव आयोग से जवाब तलब कर दिया है अब देखना होगा कि सरकार कहती है कि मौजूदा कानून पर्याप्त हैं, या फिर वह सुधार की दिशा में कोई संकेत देती है। छह हफ्तों बाद जब जवाब आएगा, तब तय होगा कि भारत में चुनावी राजनीति विचारों की होगी या विज्ञापन एजेंसियों की।