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Breaking News 29 January 2026

1 ) BJP Vs BJP : UGC के बहाने खुली सत्ता की अंदरूनी लड़ाई

भारत की राजनीति में अक्सर लड़ाइयाँ साफ़ दिखाई देती हैं  सत्ता बनाम विपक्ष, सरकार बनाम आंदोलन, संसद बनाम सड़क। लेकिन कुछ लड़ाइयाँ ऐसी होती हैं जो कैमरों के सामने नहीं, बल्कि फाइलों, मीटिंग्स और इशारों में लड़ी जाती हैं। आज देश में जो सबसे बड़ी राजनीतिक लड़ाई आकार ले रही है, वह बाहर नहीं, सत्ता के भीतर चल रही है। यह लड़ाई है बीजेपी बनाम बीजेपी की। UGC के नए नियमों को लेकर देशभर में जो विरोध देखने को मिल रहा है....उससे ये तो पता चलता है कि कुछ बहुत बड़ा होने वाला है बीजेपी के अंदर। यहीं से चर्चा शुरू होती है योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय नेतृत्व के बीच कथित मतभेदों की। यह कहना गलत होगा कि योगी और अमित शाह आमने-सामने हैं, लेकिन यह भी सच है कि दोनों की राजनीति की भाषा अलग है। अमित शाह की राजनीति डेटा, कैलकुलेशन और माइक्रो-मैनेजमेंट पर टिकी है। सीएम योगी की राजनीति सीधे जनता से जुड़ाव, सख़्त प्रशासन और भावनात्मक अपील पर आधारित है। बीजेपी आज तीन लेवल पर चल रही है RSS की वैचारिक पकड़, मोदी-शाह की सेंट्रल कमान और योगी जैसे क्षेत्रीय मास लीडर्स। समस्या तब पैदा होती है जब कोई क्षेत्रीय नेता इतना मजबूत हो जाए कि वह भविष्य में केंद्रीय नेतृत्व के लिए नेचुरल ऑप्शन लगने लगे। यही वजह है कि योगी आदित्यनाथ का नेशनल प्रोफाइल सीमित रखा गया। उन्हें केंद्र में बड़ी ज़िम्मेदारियाँ नहीं दी गईं, विदेश नीति या राष्ट्रीय मंच पर ज़्यादा आगे नहीं बढ़ाया गया। यह रणनीति योगी को कमजोर करने के लिए नहीं, बल्कि कंट्रोल में रखने के लिए है। सोशल मीडिया पर यह धारणा तेज़ी से फैल रही है कि योगी आदित्यनाथ को अगली बार मुख्यमंत्री बनने से रोका जा सकता है, ताकि वह प्रधानमंत्री पद के लिए बड़ी चुनौती न बन सकें। इसमें पूरी सच्चाई नहीं है, लेकिन यह नैरेटिव यूँ ही नहीं बना। योगी की लोकप्रियता और उनका अलग पावर बेस पार्टी के लिए एक डबल-एज्ड स्वॉर्ड है। इस पूरे विवाद के बीच उत्तर प्रदेश फिर से केंद्र में है। वजह साफ़ है यूपी सिर्फ़ सबसे बड़ा राज्य नहीं, बल्कि देश की राजनीति की धुरी है। और इस धुरी पर खड़े हैं योगी आदित्यनाथ, एक ऐसे नेता जो बीजेपी के मौजूदा पावर मॉडल में पूरी तरह फिट नहीं बैठते। योगी आदित्यनाथ कोई प्रोजेक्ट लीडर नहीं हैं। वह सोशल मीडिया से नहीं, ज़मीन से निकले नेता हैं। उनकी राजनीति फ़ाइलों से नहीं, भावनाओं से चलती है। और यही बात उन्हें लोकप्रिय भी बनाती है और पार्टी के भीतर असहज भी। UGC विवाद के दौरान योगी आदित्यनाथ का बयान “नया जिन्ना पैदा मत करो” सिर्फ़ एक लाइन नहीं थी। यह एक पॉलिटिकल सिग्नल था। इस बयान में उन्होंने सीधे तौर पर उस राजनीति पर सवाल उठाया जो समाज को नए-नए खांचों में बाँटने की कोशिश कर रही है। ऊपर से देखने पर यह बयान विपक्ष के लिए था, लेकिन असल में यह संदेश सत्ता के गलियारों तक जाता है। यह बयान बताता है कि योगी उस रास्ते से सहमत नहीं हैं जहाँ पहचान और जाति की राजनीति को नई शक्ल दी जा रही है। और यही असहमति उन्हें पार्टी के भीतर अलग खड़ा करती है। RSS आज भी सीएम योगी को पूरी तरह नज़रअंदाज़ नहीं करता। संगठन उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में देखता है जो संकट के समय काम आ सकता है। यही कारण है कि योगी न तो पूरी तरह आगे बढ़ाए जा रहे हैं और न ही पीछे धकेले जा रहे हैं। अब सवाल आता है  अगर योगी आदित्यनाथ भविष्य में मुख्यमंत्री पद की लड़ाई हार जाते हैं, तो क्या वह प्रधानमंत्री बन सकते हैं? संवैधानिक रूप से जवाब हाँ है। भारत का संविधान इसकी अनुमति देता है। लेकिन राजनीति सिर्फ़ कानून से नहीं चलती, वह जनादेश, पार्टी मैनेजमेंट और अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता से चलती है। भारत के इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण नहीं है जहाँ कोई हारा हुआ मुख्यमंत्री सीधे प्रधानमंत्री बना हो। प्रधानमंत्री बनने के लिए सत्ता का भरोसा, सहयोगियों की सहमति और जनता की स्वीकृति  तीनों चाहिए। और यह सब बिना यूपी जीते लगभग असंभव है। हालाँकि राजनीति में अगर हमेशा ज़िंदा रहते हैं। अगर भविष्य में नरेंद्र मोदी सक्रिय राजनीति से पीछे हटते हैं, अगर विपक्ष बिखरा रहता है, और अगर बीजेपी को एक सख़्त, स्पष्ट और आइडियोलॉजिकल चेहरे की ज़रूरत पड़ती है, तो योगी आदित्यनाथ एक क्राइसिस लीडर के रूप में सामने आ सकते हैं। लेकिन इसके लिए पहला दरवाज़ा वही है उत्तर प्रदेश। आने वाले समय में UGC का मुद्दा शायद ठंडा पड़ जाए, लेकिन इसके असर लंबे समय तक रहेंगे। 2027 का उत्तर प्रदेश चुनाव सिर्फ़ एक राज्य का चुनाव नहीं होगा, बल्कि यह तय करेगा कि बीजेपी की अगली पीढ़ी का चेहरा कौन होगा। अगर योगी जीतते हैं, तो उनका कद अपने आप राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ जाएगा। अगर हारते हैं, तो प्रधानमंत्री बनने की संभावना लगभग खत्म हो जाएगी। अंत में, सच्चाई यही है कि योगी आदित्यनाथ आज बीजेपी के लिए भविष्य के प्रधानमंत्री से ज़्यादा एक पॉलिटिकल इंश्योरेंस पॉलिसी हैं। जब तक सिस्टम स्थिर है, उन्हें सीमित रखा जाएगा। लेकिन अगर सत्ता का संतुलन डगमगाता है, तो वही योगी सबसे मज़बूत विकल्प बन सकते हैं। UGC विवाद, योगी के बयान और सोशल मीडिया पर चल रही बहसें यह सब उसी बड़े खेल के संकेत हैं, जो आने वाले वर्षों में भारत की राजनीति की दिशा तय करेगा।