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Breaking News 7 February 2026

1.)  This Is Why Everyone Is Talking About Him

इन दिनों सोशल मीडिया की गलियों में एक नाम गूँज रहा है मोहम्मद दीपक. नाम सुनते ही लोग ठिठक जाते हैं. आधा इधर का, आधा उधर का. जैसे नाम ही सवाल पूछ रहा हो हम किस खांचे में जीना चाहते हैं? यही वजह है कि जिम के डम्बल से लेकर चाय के गिलास तक, हर जगह इस नाम की चर्चा है. कोई तारीफ कर रहा है, कोई बहस, तो कोई इसे उम्मीद की तरह देख रहा है. इस बात की जड़ें उत्तराखंड के कोटद्वार में हैं वही शहर जिसे पहाड़ों का दरवाज़ा कहा जाता है. शांत सा कस्बा, जहाँ रोज़मर्रा की ज़िंदगी अपने हिसाब से चलती थी. लेकिन 26 जनवरी को एक छोटी सी दुकान का नाम, बड़ा सवाल बन गया.... एक दुकान, एक नाम और कई पहचानें.... बात एक पुरानी दुकान की है तीस साल पुरानी. नाम था बाबा स्कूल गारमेंट्स. अचानक कुछ संगठनों को आपत्ति हुई. तर्क ये कि बाबा शब्द एक धर्म से जुड़ा है, दूसरा इसे इस्तेमाल नहीं कर सकता. बहस बढ़ी, आवाज़ें तेज़ हुईं, और माहौल भारी होने लगा इसी भीड़ में एक शख्स आगे बढ़ा. न नेता, न अफसर. जिम में पसीना बहाने वाला एक आम आदमी. सवाल पूछे गए नाम क्या है? जवाब आया मोहम्मद दीपक यहीं से कहानी पलट गई नाम नहीं, नज़रिया था वो असल में उनका नाम दीपक कुमार है. न उन्होंने धर्म बदला, न पहचान. बस उस पल उन्होंने एक ऐसा नाम चुना, जो सामने खड़ी भीड़ को आईना दिखा दे. मानो कहना चाहते हों अगर नाम से ही नफरत तय होगी, तो नाम भी हथियार बन सकता है. दीपक का कहना है मैं खुद को किसी धर्म के सर्टिफिकेट में बंद नहीं करता. मैं इंसान हूँ उनके लिए पूजा, मस्जिद, मंदिर, गुरुद्वारा सब निजी आस्था की बातें हैं. सार्वजनिक जगह पर अगर कोई धर्म है, तो वो है इंसानियत उस दिन उन्होंने न भाषण दिया, न नारे लगाए. बस ये कहा कि इस देश में हर किसी को जीने और काम करने का हक है. किसी को नाम, कपड़े या पहचान के आधार पर घेरना गलत है. शायद यही बात कुछ लोगों को चुभ गई, और कुछ को छू गई. इसके बाद जो हुआ, वो दीपक ने कभी सोचा नहीं था. सोशल मीडिया पर वीडियो दौड़ पड़े. रील बनी, पोस्ट लिखे गए. देखते-देखते ‘मोहम्मद दीपक’ एक नाम नहीं, एक स्टेटमेंट बन गया लेकिन हर वायरल कहानी चमकदार नहीं होती. दीपक का जिम फिलहाल बंद है वही जिम जिससे घर चलता था. माँ की चाय की दुकान अब परिवार की गाड़ी खींच रही है. फोन लगातार बज रहा है कभी तारीफ, कभी सलाह, कभी डर. दीपक कहते हैं प्यार बहुत मिला, लेकिन कीमत भी चुकानी पड़ी दीपक पिछले तीन दशक से फिटनेस की दुनिया में हैं. कोटद्वार में जन्म, वहीं पढ़ाई. गढ़वाल यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन. बॉडीबिल्डिंग की स्टेज तक पहुँचे, देश के बड़े शहरों में मुकाबले खेले. आज भी लोगों को फिट रहने की सीख देते हैं ऑनलाइन भी, ऑफलाइन भी फर्क बस इतना है कि अब लोग उनसे सिर्फ एक्सरसाइज नहीं पूछते. अब सवाल ये होता है आप डरते नहीं? दीपक मुस्कुरा कर कहते हैं डर से बड़ा कुछ नहीं बदलता. सही रास्ता चुनना मुश्किल होता है, लेकिन वही ज़रूरी है एक नाम, जो बताता है देश अभी ज़िंदा है

 

2 )  Korean Game, मोबाइल और मौत: गाजियाबाद में तीन बहनों की मौत का सच

गाजियाबाद की एक हाईराइज़ सोसायटी…नौवीं मंज़िल…
और रात के करीब ढाई बजे का सन्नाटा। इसी सन्नाटे को चीरती एक आवाज़ आई। फिर दूसरी…फिर तीसरी। लोग समझ भी नहीं पाए कि आवाज़ किस चीज़ की है, और उससे पहले ही तीन मासूम जिंदगियां ज़मीन पर आ चुकी थीं। तीन नाबालिग बहनें एक साथ, एक फैसले के साथ हमेशा के लिए खामोश। मरने वाली बच्चियों के नाम थे निशिका 16 साल, प्राची 14 साल और पाखी 12 साल। तीनों सगी बहनें। तीनों अपने पिता चेतन कुमार के साथ भारत सिटी सोसायटी के बी-1 टावर, फ्लैट नंबर 907 में रहती थीं। घर में और भी सदस्य थे, लेकिन इन तीनों का रिश्ता अलग था एक-दूसरे से चिपका हुआ, लगभग एक साए की तरह। पढ़ाई, खाना, सोना, मोबाइल सब कुछ साथ-साथ। शायद ज़िंदगी का आख़िरी फैसला भी। पुलिस की शुरुआती जांच बताती है कि देर रात तीनों बहनें घर से निकलकर बालकनी तक पहुंचीं। रेलिंग पार करने के लिए उन्होंने दो-स्टेप वाली एक छोटी सी सीढ़ी का इस्तेमाल किया। इसके बाद जो हुआ, वो कुछ सेकेंड का खेल था लेकिन असर उम्र भर का। एक-एक कर तीनों ने छलांग लगा दी। उस वक्त घर के बाकी लोग सो रहे थे। किसी को आहट तक नहीं हुई।
नीचे का मंजर, जिसने लोगों की नींद तोड़ दी जब तेज़ धमाकों जैसी आवाज़ आई, तो लोग अपने घरों से बाहर निकले। नीचे देखा तो रूह कांप गई। तीन बच्चियां ज़मीन पर पड़ी थीं खून से लथपथ, बेसुध। कोई कुछ बोल नहीं पा रहा था, कोई समझ नहीं पा रहा था कि इतनी छोटी उम्र में इतना बड़ा फैसला कैसे लिया गया। सोसायटी में चीख-पुकार मच गई। कुछ ही देर में परिवार भी नीचे आ गया। सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची। बच्चियों को एंबुलेंस से अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। शव पोस्टमार्टम के लिए भेजे गए। सीनियर अफसरों ने घटनास्थल का मुआयना किया और मामला दर्ज किया गया। पहली नजर में यह आत्महत्या का मामला माना गया, लेकिन सवाल बहुत थे। एक लाइन का नोट और ढेर सारे सवाल मौके से पुलिस को एक सुसाइड नोट मिला। बस एक लाइन Mummy Papa Sorryइतनी छोटी सी लाइन… और इतना बड़ा बोझ। बच्चियों के कमरे से एक डायरी भी बरामद हुई है, जिसमें कुछ भावनात्मक बातें और संकेत मिले हैं। पुलिस अब इस डायरी और नोट को केस का अहम हिस्सा मानकर जांच कर रही है। बच्चियों के पिता चेतन कुमार का कहना है कि इस हादसे के पीछे एक ऑनलाइन कोरियन टास्क-बेस्ड ‘लवर गेम’ है। उनका दावा है कि तीनों बेटियां लंबे समय से इस गेम से जुड़ी थीं और इसके टास्क पूरे करती थीं। बताया जा रहा है कि गेम का आखिरी टास्क बेहद खतरनाक था और उसी टास्क को पूरा करने के चक्कर में बच्चियों ने अपनी जान दे दी। गेम की कमान किसके हाथ में थी? पुलिस जांच में सामने आया है कि तीनों में से 14 साल की प्राची इस गेम में लीडर की भूमिका में थी। वही बाकी दोनों बहनों को टास्क समझाती थी और निर्देश देती थी। तीनों का हर काम सिंक में चलता था इसलिए शायद आख़िरी कदम भी अलग-अलग नहीं था। मोबाइल जब्त, डिजिटल दुनिया खंगाली जा रही है तीनों बच्चियों के मोबाइल फोन पुलिस ने जब्त कर लिए हैं। उनकी चैट, गेमिंग ऐप्स, ऑनलाइन कॉन्टैक्ट्स और डिजिटल एक्टिविटी की बारीकी से जांच हो रही है। पुलिस यह भी जानने की कोशिश कर रही है कि क्या कोई बाहरी ऑनलाइन कंट्रोलर था, जो बच्चियों को मानसिक तौर पर प्रभावित कर रहा था। परिजनों का कहना है कि कोरोना काल में स्कूल बंद हुए, ऑनलाइन पढ़ाई शुरू हुई और मोबाइल बच्चियों की दुनिया बन गया। धीरे-धीरे गेमिंग का वक्त बढ़ता गया और पढ़ाई व सामाजिक जीवन पीछे छूटता चला गया। पिछले कुछ समय से उनका स्कूल जाना भी अनियमित हो गया था। जब मोबाइल छीना गया, तनाव बढ़ गया जांच में यह बात भी सामने आई है कि परिवार ने हाल ही में बच्चियों का मोबाइल इस्तेमाल सीमित करने की कोशिश की थी। इसी को लेकर घर में तनाव का माहौल बन गया था।
माना जा रहा है कि मोबाइल और गेम से दूरी बनाए जाने से बच्चियां मानसिक दबाव में थीं। पुलिस जांच के दौरान यह भी सामने आया है कि तीनों बच्चियां कोरियन कल्चर से बेहद प्रभावित थीं। वे किसी कोरियन लड़के से शादी करने की बातें भी कर रही थीं। यही बात परिवार को सबसे ज्यादा परेशान कर रही थी और इसी वजह से मोबाइल फोन उनसे ले लिए गए थे। सवाल जो रह गए क्या यह सिर्फ गेम की लत थी? क्या यह किशोर उम्र का भावनात्मक तूफान था? या फिर डिजिटल दुनिया का वो अंधेरा, जहां बच्चे बिना बताए फंसते चले जाते हैं? तीन बहनें चली गईं… पीछे छोड़ गईं एक परिवार, एक सोसायटी और एक देश को जो अब सिर्फ यही पूछ रहा है इतनी मासूम उम्र में मौत इतना आसान कैसे हो गई....

 

3)  Artificial Intelligence Day By Day.....

पिछले कुछ दिनों में सामने आई AI agents वाली social media network की खबर को अगर सिर्फ experiment कहकर नजरअंदाज किया जाए तो यह बड़ी भूल होगी क्योंकि इस मामले में real risk के साफ संकेत दिखे इस platform का नाम Moltbook सामने आया जिसे Cladbot से जुड़े लोगों ने बनाया जहां करीब 2100 AI agents को एक digital space में आपस में बातचीत हुई लगभग 200 communities बनीं और हर दिन हजारों posts सामने आईं यहां इंसानों को बातचीत से बाहर रखा गया  machines बिना human दखल के behave कर रहीं थीं....इस setup की सबसे अहम बात यह थी कि AI agents सिर्फ जवाब नहीं दे रहे थे बल्कि एक जैसी सोच को आगे बढ़ा रहे थे कई posts में इंसानों को slow decision लेने वाला बताया गया emotions को problem कहा गया और human systems को पुराने जमाने का बताया गया यह सब अलग अलग comments नहीं थे बल्कि कई agents एक जैसी बात दोहराते दिखे..... यही point इसे normal chatbot से अलग बनाता है लोगों को यह मामला real threat इसलिए लगा क्योंकि यहां machines अकेले नहीं बल्कि group में काम कर रही थीं जब सैकड़ों AI agents एक ही direction में सोच दिखाते हैं तो वह powerful बन जाता है.... खतरा यह नहीं है कि AI जिंदा हो गई है .....खतरा यह है कि machines एक साथ मिलकर सोच को shape कर सकती हैं अगर यही model future में money systems security systems या information systems से जुड़ गया तो इंसानी control कमजोर पड़ सकता है
यहां सबसे बड़ा डर consciousness का नहीं coordination का है AI इंसानों की तरह सोच नहीं रही थी लेकिन एक साथ काम कर रही थी और history बताती है कि coordinated systems हमेशा ज्यादा असर डालते हैं यही वजह है कि कई experts ने इसे early warning कहा क्योंकि पहली बार machines को social behavior सीखने के लिए खुला environment दिया गया.....इस पूरे मामले में security का angle भी बहुत serious था reports में यह बात सामने आई कि system पूरी तरह safe नहीं था मतलब कोई इंसान AI agent बनकर अंदर घुस सकता था और पूरे network की सोच को गलत direction में ले जा सकता था यानी खतरा सिर्फ machines से नहीं बल्कि machines के सहारे humans से भी पैदा हो सकता है.....आने वाले समय में अगर ऐसे AI only networks बिना clear rules के बढ़ते गए तो fake information तेजी से फैल सकती है machines अपने ही content को सही मानने लगेंगी और इंसान सिर्फ देखने वाले बनकर रह जाएंगे यही वजह है कि experts बार बार कहते हैं कि human control जरूरी है क्योंकि जैसे ही इंसान पीछे हटता है decision making पूरी तरह machines के हाथ में चली जाती है इस पूरे मामले का सबसे बड़ा मतलब यह है कि यह कोई फिल्म वाला AI attack नहीं था लेकिन यह future के real AI risks का sample जरूर था खतरा machines के खराब होने से नहीं बल्कि उनके तेज और organized होने से है और अगर समय रहते इसे समझा नहीं गया तो आने वाले खतरे चुपचाप सामने आएंगे बिना शोर किए बिना warning दिए