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Breaking News 9 March 2026

1: जंग के बीच ईरान में सत्ता बदल गई

मिडिल ईस्ट में युद्ध की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि ईरान की सत्ता के केंद्र से एक बड़ी खबर निकलकर सामने आई। अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष को दस दिन बीत चुके हैं और इसी उथल-पुथल के बीच ईरान की सर्वोच्च सत्ता में बड़ा बदलाव हो गया है। अयातुल्ला अली खामेनेई के बेटे मोजतबा खामेनेई को देश का नया सुप्रीम लीडर चुन लिया गया है। सोमवार को ईरान की प्रभावशाली धार्मिक-राजनीतिक संस्था असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स ने यह फैसला लिया। घोषणा के साथ ही परिषद ने ईरान की जनता से अपील की कि वे नए सुप्रीम लीडर के प्रति निष्ठा जताएं और इस चुनौतीपूर्ण दौर में एकजुट रहें। परिषद ने यह भी कहा कि यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है जब देश बाहरी दबाव और सुरक्षा खतरों से जूझ रहा है। सत्ता परिवर्तन के बाद ईरान की राजनीतिक और सैन्य संस्थाएं भी तेजी से नए नेता के समर्थन में आती दिखीं। ईरान के वरिष्ठ नेता अली लारिजानी ने कहा कि अली खामेनेई की मौत के बाद विरोधियों को उम्मीद थी कि ईरान राजनीतिक अस्थिरता में फंस जाएगा। लेकिन संवैधानिक प्रक्रिया के तहत मोजतबा खामेनेई को नया सुप्रीम लीडर चुन लिया गया और वे इस संवेदनशील समय में देश का नेतृत्व करने में सक्षम हैं। ईरान की सबसे ताकतवर सैन्य संस्था इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने भी नए सुप्रीम लीडर के प्रति अपनी पूरी निष्ठा जाहिर कर दी है। संगठन ने बयान जारी कर कहा कि वह नए नेता के आदेशों का पूरी तरह पालन करेगा और जरूरत पड़ी तो देश के लिए अपनी जान तक न्यौछावर करने को तैयार है। विश्लेषकों के मुताबिक IRGC का यह समर्थन इस बात का संकेत है कि सत्ता परिवर्तन के बावजूद ईरान की राजनीतिक संरचना स्थिर रहने की कोशिश कर रही है। ईरान की संसद के स्पीकर ने भी मोजतबा खामेनेई की नियुक्ति का स्वागत करते हुए कहा कि नए सुप्रीम लीडर का अनुसरण करना हर नागरिक का धार्मिक और राष्ट्रीय कर्तव्य है। यह बदलाव ऐसे समय में हुआ है जब ईरान अमेरिका और इजरायल के साथ बढ़ते सैन्य टकराव में उलझा हुआ है। न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि ईरान उम्मीद से ज्यादा मजबूत जवाब दे रहा है और लगातार अमेरिकी ठिकानों को निशाना बना रहा है। अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि अगर यह युद्ध लंबा खिंचता है तो अमेरिकी सैनिकों के हताहत होने की संख्या बढ़ सकती है। अमेरिका में भी इस घटनाक्रम को लेकर हलचल है। अमेरिका के पूर्व CIA प्रमुख डेविड पेट्रेयस ने कहा है कि मोजतबा खामेनेई का सुप्रीम लीडर बनना पश्चिमी देशों के लिए चिंता की वजह बन सकता है। उनका मानना है कि मोजतबा अपने पिता की तरह सख्त विचारधारा वाले नेता साबित हो सकते हैं और ईरान की परमाणु तथा मिसाइल नीति में किसी नरमी की उम्मीद कम है। कई विश्लेषकों का भी कहना है कि यह नियुक्ति इस बात का संकेत है कि ईरान की सत्ता में कठोर रुख रखने वाला धड़ा अब भी पूरी तरह मजबूत है। इस संघर्ष का असर अब पूरे मिडिल ईस्ट में दिखने लगा है। सुरक्षा खतरे बढ़ने के बाद अमेरिकी विदेश विभाग ने सऊदी अरब से गैर-जरूरी अमेरिकी राजनयिकों को तुरंत वापस बुलाने का आदेश दिया है। पिछले हफ्ते सऊदी अरब में अमेरिकी दूतावास के आसपास ड्रोन हमलों की खबरें भी सामने आई थीं। इसी तरह कतर, जॉर्डन, बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात, इराक और पाकिस्तान से भी गैर-जरूरी अमेरिकी कर्मचारियों को पहले ही हटा लिया गया है। वहीं कुवैत में अमेरिकी दूतावास की गतिविधियों को अस्थायी तौर पर रोक दिया गया है। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देने लगा है। तेल आपूर्ति पर खतरे की आशंका के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ गई हैं। ब्रेंट क्रूड लगभग 104 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है, जो 2022 के रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पहली बार इतना ऊपर गया है। तेल की इस तेजी का असर अमेरिका में भी दिख रहा है। अमेरिकी शेयर बाजार के फ्यूचर्स में गिरावट दर्ज की गई है, जबकि अमेरिका में पेट्रोल की औसत कीमत बढ़कर 3.45 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई है। सिर्फ एक हफ्ते में इसमें करीब 16 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।

 

2 ) क्या रूस ने ट्रंप को चुनाव जिताया था?

साल 2016 का अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव जब Donald Trump ने अमेरिका के राष्ट्रपति पद की दौड़ में जीत हासिल की, तो जीत के साथ ही शुरू हो गया आरोपों, खुफिया रिपोर्टों और अंतरराष्ट्रीय साजिशों का एक लंबा सिलसिला। चुनाव के कुछ ही समय बाद अमेरिकी खुफिया एजेंसियों CIA, FBI और NSA ने एक चौंकाने वाला दावा किया कि रूस ने अमेरिकी चुनाव को प्रभावित करने की कोशिश की थी। आरोप था कि रूस से जुड़े हैकर्स ने डेमोक्रेटिक पार्टी के सर्वर में सेंध लगाई, हजारों गोपनीय ईमेल चुरा लिए और बाद में उन्हें इंटरनेट पर लीक कर दिया। इन ईमेल में डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों की आंतरिक रणनीतियाँ और राजनीतिक चर्चाएँ शामिल थीं, जिससे चुनावी माहौल पर असर पड़ सकता था। इन आरोपों के बाद अमेरिका में एक बड़ी और ऐतिहासिक जांच शुरू की गई, जिसे Mueller Investigation के नाम से जाना गया। इस जांच का नेतृत्व विशेष वकील रॉबर्ट म्यूलर ने किया, जो पहले FBI के निदेशक रह चुके थे और जिनकी पहचान बेहद सख्त और निष्पक्ष जांचकर्ता के रूप में होती है। लगभग दो साल तक चली इस जांच में सैकड़ों गवाहों से पूछताछ हुई, लाखों पन्नों के दस्तावेज़ खंगाले गए और ट्रंप के कई करीबी सहयोगियों पर आरोप भी लगे। जांच रिपोर्ट में यह स्पष्ट रूप से कहा गया कि रूस ने सोशल मीडिया, साइबर हमलों और प्रचार अभियानों के जरिए अमेरिकी चुनाव को प्रभावित करने की कोशिश की थी। इसके लिए फर्जी सोशल मीडिया अकाउंट बनाए गए, लाखों पोस्ट और विज्ञापन चलाए गए और अमेरिकी मतदाताओं को अलग-अलग मुद्दों पर भड़काने या प्रभावित करने की कोशिश की गई। लेकिन इस पूरी जांच के बाद भी एक अहम सवाल अधूरा रह गया क्या ट्रंप की चुनावी टीम इस विदेशी हस्तक्षेप में शामिल थी?
म्यूलर रिपोर्ट का निष्कर्ष यह था कि ट्रंप के अभियान और रूस के बीच आपराधिक साजिश का कोई ठोस सबूत नहीं मिला। हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि कई संदिग्ध संपर्क जरूर हुए थे, जिनकी जांच की गई लेकिन उन्हें अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं मिले। दूसरी तरफ ट्रंप और उनके समर्थकों ने इस पूरी जांच को शुरू से ही राजनीतिक षड्यंत्र और फेक नैरेटिव बताया। ट्रंप ने कई बार सार्वजनिक रूप से कहा कि यह उनके खिलाफ चलाया गया विच हंट यानी राजनीतिक शिकार अभियान था। लेकिन इस पूरे विवाद ने दुनिया के सामने एक नई सच्चाई जरूर रख दी कि आधुनिक लोकतंत्र सिर्फ चुनावी रैलियों और टीवी बहसों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि अब इसमें साइबर स्पेस, डेटा युद्ध और डिजिटल प्रचार की अदृश्य लड़ाइयाँ भी शामिल हो चुकी हैं। दरअसल 2016 का यह विवाद सिर्फ एक चुनाव नहीं था, बल्कि यह उस नए दौर की शुरुआत का संकेत था जिसमें वैश्विक शक्तियाँ एक-दूसरे के राजनीतिक सिस्टम को इंटरनेट और सूचना युद्ध के जरिए प्रभावित करने की कोशिश कर सकती हैं। यही कारण है कि ट्रंप-रूस कनेक्शन का यह मामला आज भी अमेरिकी राजनीति की सबसे चर्चित और विवादित मामलों में से एक माना जाता है।